एक आह उठी , एक लाश गिरी,
चारो तरफ फैली हाहाकारी है !
हर नम आंखें कुछ ढूंढ रही है
पर हर तरफ फैली अंधियारी है !
अँधियारो के पीछे उठता अपनों का जनाजा है
जनजाजो के बोझ तले, कुछ खोता सा जाता है !
पर राजनीति के गलियारे ,तो मयखाने से नजर आते है ,
हर हाथो में आंसुओ से भरे ,पैमाने नज़र आते है !
भ्रस्टवाद और जातिवाद की फसल देखकर , ये कितना इतराते है
कुर्सी की चाहत में ये, इमान बेचने से भी न कतराते है !
संसद को कुरुछेत्र बनाकर ,हर दुर्योधन दम्भ भरता है ,
अर्जुन बनकर शीश काटने का, साहस कोई न करता है !
क्या हर गांडीव को जंग लगी, और तरकस वीरान हुआ जाता है ,
चक्रव्वह को भेदने का साहस,क्याो कोई नहीं कर पाता है !
क्या फिर अभिमन्यू को प्राण देकर, शंखनाद करना होगा,
नये महाभारत के सृजन को ,कृष्णा को अवतीर्ण होना होगा !
राम-कृष्णा के वन्शज हो तुम, अधर्म का संहार करो ,
नये युग के सृजन में , अपना भी कुछ योगदान करो !

