मंगलवार, 7 जुलाई 2020

एक शहीद की दस्तक




एक आह उठी , एक लाश गिरी,
 चारो तरफ फैली  हाहाकारी है !

हर नम आंखें कुछ ढूंढ रही है
पर हर तरफ फैली अंधियारी है !

अँधियारो के पीछे उठता अपनों का जनाजा है
जनजाजो के बोझ तले, कुछ खोता सा जाता है !

पर राजनीति के गलियारे ,तो मयखाने से नजर आते है ,
हर हाथो में आंसुओ से भरे ,पैमाने नज़र आते है !

भ्रस्टवाद और जातिवाद की फसल देखकर , ये कितना इतराते है
कुर्सी की चाहत में ये, इमान बेचने से भी न कतराते है !

संसद को कुरुछेत्र बनाकर ,हर दुर्योधन दम्भ भरता है ,
अर्जुन बनकर शीश काटने का, साहस कोई न करता है !

क्या हर गांडीव को जंग लगी, और तरकस वीरान हुआ जाता है ,
चक्रव्वह को भेदने का साहस,क्याो  कोई नहीं कर पाता है !

क्या फिर अभिमन्यू को प्राण देकर, शंखनाद करना होगा,
नये महाभारत के सृजन को ,कृष्णा को अवतीर्ण  होना होगा !

राम-कृष्णा के वन्शज हो तुम, अधर्म का संहार करो ,
नये युग के सृजन में , अपना भी कुछ योगदान करो !